Bijali Mahadev

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बिजली महादेव,

 

हर १२ साल में क्यों बिजली महादेव के शिवलिंग पर गिरती हैं?

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भगवान शिव के करोड़ों शिवलिंग अपने कई अलग-अलग नामों के साथ दुनिया के हर कोने में स्थापित हैं। जिनके पिछे उनका कुछ ना कुछ इतिहास रहा हैं। इसी क्रम में आज हम आपकों भगवान शिव के ऐसे शिवलिंग के बारे में अवगत कराने जा रहे हैं। जिनका नाम लेते ही मन में एक सवाल सा जन्म लेता है कि भगवान शिव के इस शिवलिंग का यह नाम क्यों और कैसे पड़ा। इसी सब रहस्यमय तथ्यों के बारे में आज हम पर्दा हटाने जा रहें है। भगवान शिव के इस शिवलिंग का नाम बिजली महादेव हैं। यह शिवलिंग हिमाचल प्रदेश के कुल्लू नामक स्थान पर आदि काल से स्थापित हैं। इसके पिछे एक बहुत प्रचलित पौराणिक कथा है। और इस स्थान का नाम कुल्लू कैसे पड़ा वो भी इस कथा में उल्लेखित हैं।

बिजली महादेव नाम पड़ने की कथा-

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मान्यता के अुनसार एक समय कुलान्त नामक दैत्य रहा करता था। जो कि वहाँ के रहने वाले जीव-जंतुओं को मिटा देने की इच्छा रखता था। इस कारण उसने नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्धरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। जिसके बाद उसने पास में बह रहे व्यास नदी के प्रवाह को अपने अजगर रूपी विशाल काय से रोक दिया था। जिससे उसके इस कार्य के चलते तीनों लोेकों में हाहाकार मच गया। यह देख महादेव ने जब उस राक्षस को समझाना चाहा तो उसने महादेव पर ही हमला बोल दिया। कुछ समय बाद महादेव ने किसी तरह से उस राक्षस को अपने भरोसे में ले कर, धिरे से उसके कान में यह कह दिया कि तुम्हारें पूंछ में आग लगी हैं। यह सून कर उस अजगर रूपी राक्षस ने जैसे ही पीछे मूड़ कर अपनी पूंछ देखना चाहा, वैसे ही महादेव ने अवसर देखते ही अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया। उस राक्षस का वध होते ही उसका अजगर रूपी शरीर एक विशाल काय पहाड़ में परिवर्तित हो गया। जिसके बाद भगवान शिव ने आगामी काल में फिर से यह राक्षस वहां रह रहे जीवजंतु को किसी तरह की हानी न पहुंचा सके।

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इसके लिए भगवान शिव ने उस पर्वत की चोटी पर शिवलिंग रूप में स्वयं वास करने लगे। और इसके साथ ही साथ इंद्र को हर बारह साल में अपने बर्ज से बिजली सिर्फ शिवलिंग पर गिराने का आदेश दिया। जिससे कि वह राक्षस कभी भी फिर से किसी तरह का जीव-जंतुओं का अहित न कर सके। और जीव-जंतुओं को बिजली गिरने से किसी प्रकार का अहित ना हो इसके लिए महादेव ने स्वंय पर बिलजी गिरवाने का निर्णय लिया। और तभी से आज तक इस शिलशिला बदस्तूर चलता चला आ रहा हैं। बिजली गिरने से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित करके मंदिर का पुजारी मक्खन के द्वारा पुन: शिवलिंग को जोड़कर स्थापित कर लेता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है। इसी वजह से भगवान शिव को यहां बिजली महादेव कहा जाता है। भादों के महीने में यहां मेला-सा लगा रहता है। इसके साथ शिवरात्रि पर भी यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। और मान्यता है कि कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित हैं। संक्षेप में यह भी कहा जाता है कि शायद कुल्लू घाटी का नाम इसी कुलान्त दैत्य के नाम से ही पड़ा हैं। कुल्लू शहर से बिजली महादेव की पहाड़ी लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर हैं।

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