Jaatak ke Kundali me Sani ka 12 Bhavo me uska Prabhav aur kya hai uska Upay?

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जातक के कुण्डली में शनि का बारह भावों में उसका प्रभाव और क्या है उसका उपाय?

sani grah

सूर्य पुत्र शनि सभी ग्रहों में सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता है। जो समय-समय पर अनुचित कर्म करने वालों को सही राह पर लाने के लिए दण्ड देते है। शनि और उनके पिता सूर्य अगर कुण्डली में एक ही भाव में हों या परस्पर दृष्टि संबंध हो तो अनिष्ट फल देते हैं। इस शनि ग्रह के नाम मात्र सुनने से ही हमारें मन में उनके प्रति भय घर जाती है। परन्तु दुष्ट कर्म करने वालों को दण्ड देते है और धर्म पर चलने वालों को पुरस्कार संबंधीत राजा भी बना देते है। यह वह ग्रह है जो राजा को रंक और रंक को राजा भी बना सकते है। यह अधर्म पर चलने वालों के शत्रु और धर्म पर चलने वालों के मित्र हैं।
बता दें कि शनि किसी जातक के जीवन में क्या फल देगा, शुभ प्रभाव होंगे या अशुभ, इसका विवेचन, कुण्डली के १२ भावों, १२ राशियों, २७ नक्षत्रों, शनि की दृष्टि, उसकी गति, वक्री या मार्गी स्थिति, कारकत्व, जातक की दशा, गोचर, साढ़ेसाती या ढैय्या, ग्रह के नीच, उच्च या शत्रु होने या किसी अन्य ग्रह के साथ होने, ग्रह की डिग्री, विशष योगों, कुण्डली के नवांश आदि के आधार पर किया जाता है, केवल एक सूत्र से नहीं।
शनि की कुल दशा १९ वर्ष होती है और इसके अलावा साढ़ेसाती तथा दो ढैय्या का समय जोड़ा जाए तो शनि किसी के भी जीवन को लगभग ३१ साल तक प्रभावित करता है। शनि ३० वर्ष में उसी राशि में पुन: लौटता है इसलिए किसी के जीवन में तीन से अधिक बार साढ़ेसाती नहीं लगती। अक्सर एक जातक ३री साढ़ेसाती के आस-पास परलोक सिधार जाता है। यही कारण है कि जीवन में अधिकतर उपाय शनि के ही किए जाते हैं।

        मंगल की राशि मेष में शनि नीचस्थ होता है और शुक्र की राशि तुला में उच्चस्थ होते है। शनि जिस भाव में विराजते हैं उसका भला करते हैं परन्तु ३री, ७वीं और १०वीं दृष्टि से अनिष्टता प्रदान करते हैं। कभी एक परिमाण से फलादेश का परिणाम नहीं देखा जाता।
शनि कुण्डली के त्रिक(६,८,१२) भावों का कारक है। शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है। लेकिन अपने पिता के शत्रु होने से पहला घर सूर्य और मंगल ग्रह से प्रभावित होता है। पहले घर में शनि तभी अच्छे परिणाम देगा जब तीसरे, सातवें या दसवें घर में शनि के शत्रु ग्रह न हों। यदि बुध या शुक्र, राहू या केतू, सातवें भाव में हों तो शनि हमेशा अच्छे परिणाम देगा। शनि ग्रह के संबंध में अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये वह शत्रु नही मित्र है। मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को प्रताड़ित करता है। शास्त्रों में वर्णन है कि शनि वृद्ध, तीक्ष्ण, आलसी, वायु प्रधान, नपुंसक, तमोगुणी और पुरूष प्रधान ग्रह है। इसका वाहन गिद्ध है। शनिवार इसका दिन है। स्वाद कसैला तथा प्रिय वस्तु लोहा है। शनि राजदूत, सेवक, पैर के दर्द तथा कानून और शिल्प, दर्शन, तंत्र, मंत्र और यंत्र विद्याओं का कारक है। ऊसर भूमि इसका निवासस्थान है। इसका रंग काला है। यह जातक के स्नायु तंत्र को प्रभावित करता है। यह मकर और कुंभ राशियों का स्वामी तथा मृत्यु का देवता है। यह ब्रह्म ज्ञान का भी कारक है, इसिलिए शनि प्रधान लोग संन्यास ग्रहण कर लेते हैं। आइये जानते है कि कुण्डली के किस लग्न में शनि होने से क्या प्रभाव मिलता है।

शनि का कुण्डली के प्रथम लग्न में-

जिस जातक की कुण्डली में शनि प्रथम भाव में हो वह जातक राजा के समान जीवन जीने वाला होता है। यदि शनि अशुभ फल देने वाला है। जिन जातकों के जन्म काल में शनि वक्री होती है वे भाग्यवादी होते हैं। उनके क्रिया-कलाप किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित होते है। वह जातक अपने पिता के प्रति उतना आज्ञाकारी नहीं होता है। प्रथम भाव में शनि वाले जातक एकांतवासी होकर प्राय: साधना में लगे रहते हैं। धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि में शनि वक्री होकर लग्न में स्थित हो तो जातक राजा या गांव का मुखिया होता है।
उपाय:
१. शराब और मांसाहारी भोजन के सेवन से स्वयं को बचाएं।
२. शनिवार के दिन न तो तेल लगाए और न ही तेल खाए।
३. बरगद के पेड़ की जड़ों पर मिठे दूध चढ़ानें से शिक्षा और स्वास्थ्य में सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।
४. भगवान शनिदेव या हनुमान जी के मंदिर में जाकर यह प्रार्थना करें।
५. शनि दोष निवारण मंत्र का जाप प्रतिदिन करें।

शनि का कुण्डली के दूसरे लग्न में-

जिस जातक की कुण्डली में दूसरे घर में शनि हो वह लकड़ी संबंधी व्यापार, कोयला एवं लोहे के व्यापार में धन अर्जित करता हैं। जातक बुद्धिमान, दयालु और न्यायकर्ता होता है। जातक धन का आनंद लेता है और धार्मिक स्वभाव का होता है। जातक की वित्तीय स्थिति सातवें भाव में स्थित ग्रह पर निर्भर करेगी। परिवार में पुरूष सदस्यों की संख्या छठवें भाव और आयु आठवें भाव पर निर्भर करेगी। दूसरे भाव में शनि जातक को परिवार से दूर करता है। ऐसा जातक सुख, साधन व समृद्धि की खोज में दूर देश विदेश की यात्रा करता है। उसका भाग्योदय पैतृक निवास से दूर होता है। जातक असत्य बोलने वाला, चंचल, बातूनी तथा दूसरों को मूर्ख बनाने में कुशल होता है।

उपाय:
१.लगातार ४३ दिनों तक नंगे पांव हनुमान मंदिर जाएं।
२.अपने माथे पर दही या दूध का तिलक लगाएं और मांसाहार तथा शराब के सेवन से बचें।
३.सांप को दूध पिलांए और कभी भी सांप को तंग ना करें और ना ही मारें।
४.दो रंग वाली गाए या भैंस कभी भी ना पालें। रोज शनिवार को कड़वे (तिल व सरसो) तेल का दान करें।
५.शनिवार के दिन किसी तालाब, नदी में मछलियों को आटा का चारा खिलाएं।

शनि का कुण्डली के तीसरे लग्न में-

अगर कुण्डली में तीसरे भाव में शनि हो तो जातक बुद्धिमान और उदार होता है। इसके बावजूद जातक आलस्य से भरा आलसी शरीर वाला होता है। ऐसे जातक के चित में हमेशा अशांति रहती है। आपने लोगों से संघर्षपूर्ण स्थितियों और कठिन परिश्रम के बाद भी मिलने वाली असफलता जातक को परेशान करती है। ऐसे जातकों को भाइयों से तनावपूर्ण संबंध रहते है। ऐसे जातक को माता पिता से मात्र आशीर्वाद के अलावा और कुछ प्राप्त नहीं होता। तीसरा घर मंगल का होता है इस घर में शनि का प्रभाव आमतौर पर अच्छा होता है। यदि जातक शराब और मांसाहार से दूर रहता है तो वह लम्बे और स्वस्थ जीवन का आनंद भोग करेगा।

उपाय:
१.बुरे प्रभावों से बचने के लिए तीन कुत्तों की सेवा करें।
२.घर का मुख्य दरवाजा यदि दक्षिण दिशा की ओर हो तो उसे बंद करवा दें।
३.प्रतिदिन शनि चालीसा पढ़ें, दूसरों को भी शनि चालीसा भेंट करें।
.शराब और मांसाहार का सेवन कदापि ना करें साथ ही गले में शनि यंत्र धारण करें।
५.मकान के आखिर में एक अंधेरा कमरा बनवाएं और घर में एक काला कुत्ता पालें।

शनि का कुण्डली के चौथे लग्न में-

यदि जन्म कुण्डली में शनि चौथे भाव या लग्न में हो तो जातक गृहहीन होता है। ऐसे जातक की या तो माता नहीं होगी या माता को कष्ट होता है। ऐसा मनुष्य बचपन में रोगी भी रहता है। यह भाव सुख का भाव माना जाता है। ऐसा मनुष्य घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी नहीं निभाता और अंत में संन्यासी बन जाता है। लेकिन, चतुर्थ में शनि तुला, मकर या कुंभ राशि का हो तो जातक को पूर्वजोंं की संपत्ति प्राप्त होती है। चौथे भाव में शनि जातक को पित्त तथा वायु विकार से ग्रस्त रखता है। अभिभावक से जातक के विचार और सोच एक दूसरे से विरूद्ध होते है। जातक को व्यापार के प्रारम्भ में अनेक घोर संकट प्रकट होते है।

उपाय:
१.सांप को दूध पिलांए अथवा किसी गाय या भैंस को दूध-चावल खिलाएं। किसी वुंâए में दूध डालें और रात में दूध न पियें।
२.पराई स्त्री से अवैध संबंध कदापि न बनाएं। कौवों को दाना खिलाएं।
३.कच्चा दूध शनिवार दिन कुएं में डालें।
४.एक बोतल शराब शनिवार के दिन बहती नदी में प्रवाहित करें।
५.शनिवार के दिन अपने भार के दसवें हिस्से के बराबर वजन का बादाम नदी में प्रवाहित करें।

शनि का कुण्डली के पांचवें लग्न में-

पंचम भाव का वक्री शनि बेहतर प्रेम संबंध देता है। इसके बावजूद जातक प्रेमी को धोखा देता है। वह पत्नी एवं बच्चे की भी परवाह नहीं करता है। जातक भ्रमण करता है अथवा उसकी बुद्धि भ्रमित रहती है। अगर पंचम भाव मे शनि हो तो वह आदमी ईश्वर में विश्वास नहीं करता है और मित्रों से द्रोह करता है। ऐसा जातक पेट पीड़ा से परेशान, घूमनेवाला, आलसी और चतुर होता है। जिस जातक के पंचम भाव में शनि होता है उसका दिमाग फिजूल विचारों से ग्रस्त रहता है। यदि शनि उच्च का होकर पंचम हो तो जातक के पैरों में कमजोरी ला देता है। मेष, सिंह, धनु राशि का शनि जातक में अहम का उदय करता है। जातक अपने विचारों को गोपनीय रखता है।

उपाय:
१.चमड़े के जूते, बैग, अटैची आदि का प्रयोग न करें और शनिवार का व्रत करें।
२.चार नारियल बहते जल में प्रवाहित करें, परंतु नदी का जल स्वच्छ होना चाहिए।
३.हर शनिवार के दिन काली गाय को घी लपेटी हुई रोटी नियमित रूप से खिलाएं।
४.शनि यंत्र धारण करें।
५.बादाम का एक हिस्सा मंदिर में बाटें और दूसरा हिस्सा लाकर घर में रख दें।

शनि का कुण्डली के छठें लग्न में-

कुण्डली के छठें भाव मे अगर शनि हो तो इससे संबंधित काम रात में करने से हमेशा लाभ होगा। यदि शादी के २८ साल के बाद होगी तो अच्छे परिणाम मिलेंगे। यदि केतु अच्छी स्थित में हो जातक धन, लाभदायक यात्राओं और बच्चों क सुख का आनंद पाता है। जिस जातक की कुण्डली में शनि छठें भाव में हो तो वह कामी, सुंदर, शूरवीर, अधिक खाने वाला, कुटिल स्वभाव, बहुत शत्रुओं को जीतने वाला होता है। षष्ठ भाव का वक्री शनि यदि निर्बल हो तो रोग, शत्रु एवं ऋण कारक होता है।

उपाय:
१.एक काला कुत्ता पालें और उसे प्रतिदिन भोजन करायें।
२.किसी भी स्वच्छ नदी या बहते पानी में नारियल और बादाम बहाएं।
३.सांप की सेवा बच्चों के कल्याण के लिए फायदेमंद साबित होगी।
४.चमड़े के जूते, बैग, अटैची आदि का प्रयोग न करें और शनिवार का व्रत करें।

शनि का कुण्डली के सातवें लग्न में-

लग्न का सातवां घर बुध और शुक्र से प्रभावित होता है। दोनों ही शनि के मित्र ग्रह हैं, इसलिए शनि इस घर में बहुत अच्छा परिणाम देता है। शनि से जुड़े व्यवसाय जैसे मशीनरी और लोहे का काम जातक के लिए बहुत लाभदायक होता है। यदि जातक अपनी पत्नी से अच्छे संबंध रखता है तो वह अमीर और समृद्ध होगा और लंबी आयु के साथ अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेगा। यदि बृहस्पति पहले घर में हो तो जातक को सरकार से लाभ होगा। यदि जातक व्यभिचारी हो जाता है या शराब पीने लगता है तो शनि नीच और हानिकारक हो जाता है।

उपाय:
१.किसी बांसुरी में चीनी भरें और उसे ले जाकर किसी सुनसार जगह जैसे कि जंगल आदि में दफना दें।
२.काली गाय की सेवा करें। पराई स्त्री से अवैध संबंध कदापि न बनाएं।
३.मिट्टी के पात्र में शहद भरकर खेत में मिट्टी के निचे दबा दें।
४.अपने हाथ में काले घोड़े की नाल का नाव की कांटी की अंगूँप् धारण करें।

शनि का कुण्डली के आठवें लग्न में-

कुण्डली के आठवें लग्न में कोई भी ग्रह शुभ नहीं माना जाता है। जिसके आठवें लग्न में शनि हो वह जातक दीर्घायु होगा लेकिन उसके पिता की उम्र कम होती है और जातक के भाई एक-एक करके शत्रु बनते जाते हैं। यह घर शनि का मुख्यालय माना जाता है, लेकिन यदि बुुध, राहू और केतु जातक की कुण्डली में नीच के हैं तो शनि बुरा परिणाम देगा।

उपाय:
१.अपने साथ हमेशा चांदी का एक चौकोर टुकड़ा रखें।
२.नहाते समय पानी में दूध डालें और किसी पत्थर या लकड़ी के आसन पर बैठ कर स्नान करें।
३.गले में चांदी की चेन धारण करें और शराब व मांस का सेवन ना करें।
४.शनिवार के दिन आँ किलो उड़द बहती नदी में प्रवाहित करें।
५.उड़द दाल काले कपड़े में बांध कर ले जाए और गांँठ खोलकर उड़द दाल को नदी में जल में प्रवाहित कर दें।

शनि का कुण्डली के नौवें लग्न में-

जिसके कुण्डली के नौवें लग्न में शनि हो वैसे जातक के तीन घर होंगे। जातक एक सफल यात्रा संचालक (टूर आंपरेटर) या सिविल इंजीनियर होगा। वह एक लंबे और सुखी जीवन का आनंद लेगा साथ ही जातक के माता-पिता भी सुखी जीवन का आनंद लेंगे। यहां स्थित शनि जातक की तीन पीढ़ियों शनि के दुष्पुभाव से बचाएगा। अगर जातक दूसरों की मदद करता है तो शनि ग्रह हमेशा अच्छे परिणाम देगा।

उपाय:
१.बहते पानी में चावल या बादाम बहाएं। बृहस्पति से संबंधित(सोना, केसर) और चंद्रमा से संबंधित (चांदी, कपड़ा) का काम अच्छे परिणाम देंगे।
२.पीले रंग का रूमाल सदैव अपेन पास रखें और साबुत मूंग मिट्टी के बर्तन में भरकर नदी में प्रवाहित करें।
३.सवा ६ रत्ती का पुखराज गुरूवार के दिन धारण करें।
४.शनिवार के दिन कच्चा दूध कुएं में डालें।
५.हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं।

शनि का कुण्डली के दसवें लग्न में-

कुण्डली के दसवें भाव में शनि लाभदायक होता है। यह शनि का अपना घर है, जहां शनि अच्छा परिणाम देगा। जातक तब तक धन और संपत्ति का आनंद लेता रहेगा, जब तक कि वह घर नहीं बनवाता। जातक महत्वाकांक्षी होगा और सरकार से लाभ का आनंद लेगा। जातक को चतुराई से काम लेना चाहिए और एक जगह बैठ कर काम करना चाहिए। तभी उसे शनि से लाभ और आनंद मिल पाएगा। दशम भाव का शनि होने पर व्यक्ति धनी, धार्मिक, राज्यमंत्री या उच्चपद पर आसीन होता है। दशमस्थ शनि वक्री हो तो जातक वकील, न्यायाधीश, बैरिस्टर, मुखिया, मंत्री या दंडाधिकारी होता है।

उपाय:
१.प्रतिदिन मंदिर जाएं और शराब, मांस और अण्डे से परहेज करें।
२.दस अंधे लोगों को भोजन कराएं, पीले रंग का रूमाल सदैव अपने पास रखें।
३.जातक अपने कमरे के पर्दे, बिस्तर का कवर, दीवारों का रंग आदि पीले रंग से रंगवाएं।
४.गुरूवार को पीले लड्डू बाटें। अपने नाम से मकान न बनवाएं।
५.अपने ललाट पर प्रतिदिन दूध अथवा दही का तिलक लगाएं और शनि यंत्र धारण करें।

शनि का कुण्डली के ग्यारहवें लग्न में-

जिसकी कुण्डली के ग्यारहवें लग्न में शनि हो उस जातक के भाग्य का निर्धारण उसकी उम्र के ४८ वर्ष में होगा। जाकत कभी भी नि:संतान नहीं रहेगा। जातक चतुराई और छल से पैसे कमाएगा। शनि ग्रह राहु और केतू की स्थिति के अनुसार अच्छा या बुरा परिणाम देगा। जिस व्यक्ति की कुण्डली में ग्यारहवें भाव में शनि हो वह लंबी आयु वाला, धनी, कल्पनाशील, निरोग, सभी सुख प्राप्त करने वाला होता है। एकादश भाव का शनि जातक को चापलूस बनाता है। व्यय भावस्थ वक्री शनि निर्दयी एवं आलसी बनाता हैंं।

उपाय:
१.किसी महत्वपूर्ण काम को शुरू करन से पहले ४३ दिनों तक तेल या शराब की बूंदें जमीन पर गिराएं।
२.शराब और मांसाहार का सेवन ना करें और अपना नैतिक चरित्र सुधारें।
३.मित्र के वेश में छुपे शत्रुओं से सावधान रहें। सूर्योदय से पूर्व शराब और कड़वा तेल मुख्य दरवाजे के पास भूमिपर गिराएं।
४.पर स्त्री गमन न करें और शनि यंत्र धारण करें।
५.कच्चा दूध शनिवार के दिन कुएं में डालें और कौवों को दाना खिलाएं।

शनि का कुण्डली के बारहवें लग्न में-

कुण्डली के बारहवें लग्न में शनि अच्छा परिणाम देता है। जातक के दुश्मन नहीं होंगे। उसके कई घर होंगे। उसके परिवार और व्यापार में वृद्धि होगी। वह बहुत अमीर हो जाएगा। हालांकि, यदि जातक शराब पिए, मांसाहार करे या अपने घर के अंधेरे कमरे में रोशनी करे तो शनि नीच का हो जाएगा। बाहरवें भाव में शनि होने पर व्यक्ति अशांत मन वाला, पतित, बकवादी, कुटिंल दृष्टि निर्दय, निर्लज, खर्च करने वाला होता है।

उपाय:
१.जातक को असत्य नहीं बोलना चाहिए साथ ही शराब और मांस से दूर रहना चाहिए।
२.चार सूखे नारियल बहते जल में प्रवाहित करें और शनि यंत्र धारण करें।
३.शनिवार के दिन काले कुत्ते और गाय की रोटी खिलांए और कड़वे तेल व उड़द दाल दान करें।
४.सर्प को दूध पिलाएं और किसी काले कपड़े में बारह बादाम बांधकर उसे किसी लोहे के बर्तन में भरकर किसी अंधेरे कमरे में रखने से अच्छे परिणाम मिलेंगे।

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