Radha Janm ki Sampurn Katha, Shrikrishna ki tarah Aanadi aur Aajanmi Thi

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 राधा जन्म की समूर्ण कथा

श्रीकृष्ण की तरह अनादि एवं अजन्मी थी

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पुराण के अनुसार, देवी राधा भगवान श्री कृष्ण से ग्यारह महीने बड़ी थी। कृष्ण और राधा की प्रेम कहानी तो सदियों से अधिकतर लोगों की प्रिय रही है, लेकिन क्या आपने कभी राधा रानी के जन्म की कहानी सुनी है। धर्म ग्रंथों के अनुसार राधा रानी का भी जन्म अपनी माँ की कोख से नहीं हुआ था। पुराण के अनुसार, राधा भी श्रीकृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा के संबंध में बहुत ही ऐसी बातें बताई गई हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। आइए जानते हैं राधा के जन्म की कहानी।

आज हम आपके समक्ष राधा जी के जन्म से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य प्रस्तुत करेंगे जिससे तकरीबन हर कोई अनजान है। राधा जी का जन्म कहां हुआ? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका सटीक जवाब हमें ब्रह्मवैवर्त पुराण के माध्यम से प्राप्त होता है। इस महान ग्रंथ के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाजी का जन्म हुआ और इसी दिन को आज भी राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इसी दिन ब्रज में श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधा का जन्म हुआ था। परंतु राधा के जन्म की कहानी साधारण नहीं, अपितु चमत्कारी है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा भी श्रीकृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी है। उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ। इस पुराण में दर्ज राधा के जन्म से जुड़े एक पौराणिक कथा के अनुसार देवी राधा भगवान श्री कृष्ण के साथ गोलोक में निवास करती थीं। एक बार देवी राधा गोलोक में नहीं थी तब श्रीकृष्ण अपनी एक अन्य पत्नी विरजा के साथ विहार कर रहे थे। राधा को इस की जैसे ही सूचना मिली वह गोलोक लौट आर्इं। इन्होंने विरजा को श्रीकृष्ण के संग विहार करते हुए देखा तो कृष्ण को भला बुरा कहने लगीं। राधा को क्रोधित देखकर विरजा नदी बनकर वहां से चली गई। परंतु राधा का यह क्रोध कृष्ण के सेवक एवं मित्र श्रीदामा को गवारा ना हुआ। उन्होंने राधा से ऊंची आवाज में बात की और उन्हें अपमानित किया। इससे देवी राधा और क्रोधित हो गई और क्रोधावस्था में श्रीदामा को श्राप दे दिया कि पृथ्वी लोक में उसका जन्म राक्षस कुल में होगा। इस कारण श्रीदामा, शंखचूड़ नामक असुर बना। श्रीदामा ने भी आवेश में आकर देवी राधा को पृथ्वी पर मुनष्य रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया।

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कथा के अनुसार जब श्रीदामा और राधा ने एक-दूसरे को श्राप दे दिया, उसके बाद श्रीकृष्ण चिंता में ग्रस्त राधा के पास आए और उनसे कहा कि देवी आप पृथ्वी पर जन्म तो लेंगी लेकिन हमेशा मेरे आसपास ही रहेंगी। वे आगे बोले, आपको गोकुल में देवी कीर्ति और वृषभानु की पुत्री के रूप में जन्म लेना होगा। वहां तुम्हारा विवाह रायाण नामक एक वैश्य से होगा और सांसारिक तौर पर तुम रायाण की पत्नी कहलाओगी। रायाण मेरा ही अंश होगा। राधा रूप में तुम मेरी प्रिया बनकर रहोगी और कुछ समय तक आपका मेरा विछोह रहेगा। इस के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने देवी से कहा कि अब आप वृषभानु के घर में जन्म लेने की तैयारी करें। संसार की दृष्टि में राधा की माता कीर्ति गर्भवती हुर्इं लेकिन उनके गर्भ में राधा ने प्रवेश नहीं किया। कीर्ति ने अपने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था और योगमाया के सहयोग से कीर्ति ने वायु को जन्म दिया लेकिन वायु के जन्म के साथ ही वहां राधा कन्या रूप मे प्रकट हो गर्इं। इसलिए यह माना जाता है कि देवी राधा अयोनिजा थीं।

नोट: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण के बाएं अंग से एक सुंदर कन्या प्रकट हुई, प्रकट होते ही उसने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में फूल अर्पित किए। श्रीकृष्ण से बात करते-करते वह उनके साथ सिंहासन पर विराजीत हो गई। यह सुंदर कन्या ही राधा रानी ही थी।

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